जून 2026 में भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत दो बार रखा जाएगा। पहला प्रदोष व्रत 12 जून 2026 को त्रयोदशी तिथि के अवसर पर मनाया जाएगा, जबकि दूसरा प्रदोष व्रत 27 जून 2026 को पड़ेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत का पालन किया जाता है, जिसे शिव कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
प्रदोष व्रत का महत्व
प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है।
एक गरीब ब्राह्मणी का संघर्ष
प्राचीन समय में एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ रहती थी। पति के निधन के बाद उसके जीवन-यापन का कोई साधन नहीं बचा था। वह प्रतिदिन अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करती थी।
एक दिन जब वह भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तब उसे मार्ग में एक घायल और अचेत बालक दिखाई दिया। दयालु ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई और उसकी सेवा-सुश्रुषा करने लगी।
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घायल बालक निकला विदर्भ का राजकुमार
कुछ दिनों बाद जब बालक स्वस्थ हुआ, तब पता चला कि वह विदर्भ राज्य का राजकुमार है। शत्रुओं ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राजपाट छीन लिया था। अपनी जान बचाने के लिए वह भटकता हुआ वहां पहुंचा था।
ब्राह्मणी ने उसे अपने पुत्र के समान स्नेह दिया और वह दोनों के साथ रहने लगा।

अंशुमति और राजकुमार का मिलन
समय बीतने पर अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा। उसके तेज, विनम्रता और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वह अपने माता-पिता को उससे मिलाने ले आई।
राजकुमार से मिलकर अंशुमति के माता-पिता भी अत्यंत प्रसन्न हुए। उसी दौरान एक रात उन्हें स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। शिवजी ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी पुत्री अंशुमति का विवाह उस राजकुमार से कर दें।
भगवान की आज्ञा को स्वीकार करते हुए उन्होंने शीघ्र ही दोनों का विवाह संपन्न करा दिया।
प्रदोष व्रत का चमत्कार
उधर ब्राह्मणी पूर्ण श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ नियमित रूप से प्रदोष व्रत रखती थी। वह भगवान शिव की आराधना करती और प्रदोष काल में उनकी पूजा-अर्चना करती थी।
उसकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस पर अपनी कृपा बरसाई। अंशुमति के पिता ने अपनी सेना की सहायता राजकुमार को प्रदान की। राजकुमार ने युद्ध में अपने शत्रुओं को परास्त कर विदर्भ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया और अपने पिता को भी सम्मानपूर्वक सिंहासन पर स्थापित किया।
ब्राह्मणी को मिला भक्ति का फल
राज्य प्राप्त होने के बाद राजकुमार ने ब्राह्मणी और उसके पुत्र के उपकार को कभी नहीं भुलाया। उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया और पूरे परिवार को सम्मान एवं सुख-सुविधाएं प्रदान कीं।
इस प्रकार भगवान शिव की कृपा और प्रदोष व्रत के प्रभाव से एक निर्धन ब्राह्मणी का जीवन बदल गया तथा राजकुमार को उसका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।
कथा से मिलने वाली सीख
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, सेवा और भगवान शिव में अटूट विश्वास रखने वाले भक्तों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है। प्रदोष व्रत को विधिपूर्वक करने और शिवजी की आराधना करने से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर हो सकती हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
ॐ नमः शिवाय।



























